"वह साधक जो आत्मानुशासन की विविध स्थितियों से होकर गुजरता है, शुद्घता के चरणों को पार करता है, उसे उस अनजाने तथ्य का रहस्योद्घाटन होता है, उसी को ज्ञान के द्वारा उच्चावस्था प्राप्त होती है और वह ईश्वर के साथ एकाकार हो सकता है।"
शास्त्र ''मैं''
हज़रत सलाहेद्दीन अली नादर अंघा द्वारा